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Sikh dharm Ka itihas - सिख धर्म का इतिहास

Sikh dharma Ka sampooran itihas । सिख धर्म का संपूर्ण इतिहास


Sikh Dharma Guru


sikh dharam ki sthapna से पहले 13 वी सदी के प्रारंभ से ही पंजाब में मुस्लिम राज्य की स्थापना हो गई। मुस्लिम शासकों ने मजहबी राज्य की स्थापना के अंतर्गत मुस्लिमों को उचित स्थान एवं अन्य धर्मों के नागरिकों को दूसरे दर्जे का स्थान दिया। दिल्ली सल्तनत की मजहबी कट्टरता की नीति से संघर्ष प्रारंभ हुआ। देवालयों के स्थान पर मस्जिदों का निर्माण आम बात थी ।  असहिष्णुता एवं घृणा का वातावरण बनता जा रहा था । ऐसे वातावरण में गुरु guru nanak dev ji  का जन्म हुआ।

गुरु नानक देव (1469-1539)

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गुरु नानक देव

गुरु नानक देव (Guru Nanak Dev) का जन्म  15 अप्रैल 1469 ई  को हुआ। इनका विवाह सुलखनी के साथ हुआ। नानक की अध्यात्म के प्रति रुचि थी। नानक ने "मानुष की जात सबै एक" इसी तत्व का प्रचार करते हुए भारत भ्रमण किया। इनकी इसी तरह की यात्राओं को उदासियां कहा जाता है। गुरु नानक देव की शिक्षाएं एक ईश्वर में विश्वास ,नाम की महानता और उपासना, गुरु की महानता इत्यादि थी। मानव को शुभ कर्म करने पर बल दिया एवं जाति पांति ऊंच-नीच का विरोध कर समाज सुधार का कार्य किया । उनका कहना था - "करमा दे होगणे नवेड़े, जाति किसे पूछनी नहीं। " जपुजी, पट्टी,आरती, रहिरस एवं बारह माह इनकी प्रसिद्ध रचनाएं हैं। सिख धर्म (Sikh religion) का प्रवर्तन कर नानक ने विश्व के धर्म सुधार को एवं समाज सुधार को में अपना स्थान बना लिया।

गुरु अंगद देव (1539 ई. से 1552 ई.)

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गुरु अंगद देव

नानक देव की शिक्षाओं को स्पष्ट करने का कार्य गुरु अंगद देव (Guru Angada Dev) ने किया जो नानक के शिष्य थे। उन्होंने इस हेतु गुरुमुखी लिपि का विकास किया नानक देव की वाणी को गुरु वाणी के रूप में लिपिबद्ध कराया लंगर प्रथा का प्रचलन सत्संग के केंद्र 'मंझिया' की स्थापना गुरु ग्रंथ साहिब (Guru Granth Sahib) संकलित करवाना आदि महत्वपूर्ण कार्य किए। 1552 ईस्वी में गुरु अंगद की मृत्यु व्यास नदी के किनारे हुई।

गुरु अमरदास (1552 ई. से 1574 ई.)

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गुरु अमरदास

गुरु अंगद देव जी की मृत्यु के बाद उनके शिष्य अमरदास (Guru Amardas)को नया गुरु बनाया गया। उन्होंने लंगर प्रथा ,मंजी प्रथा को कठोरता से लागू किया वैशाखी को त्यौहार बनाया एवं सती प्रथा का विरोध किया। बादशाह अकबर भी उनके दर्शन करने गोइंदवाल स्थान पर आया था। गोइंदवाल स्थान गुरु अमरदास के कारण तीर्थ स्थान माना जाता है।

गुरु रामदास (1574 ई. से 1581 ई.)

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गुरु रामदास

 गुरु रामदास(Guru Ramdas) ने धार्मिक केंद्रों की संख्या को बढ़ाया और एक विशाल sarovar बनवाया जो Amritsar कहलाया। सिखों का विख्यात नगर अमृतसर इसी नाम से है। यहां के शक्तिशाली समृद्ध किसान सिख धर्म के अनुयाई बने। गुरु रामदास के कहने पर हरिद्वार यात्रा पर लगने वाला कर अकबर ने हटाया। अकबर से मित्रता रखकर रामदास ने सिखों की संख्या में वृद्धि की। गुरु रामदास ने गरीबों को दान देने की मसंद प्रथा का प्रचलन किया। गुरु सतगुरु के साथ-साथ 'सच्चा पातशाह' भी कहलाने लगे।

गुरु अर्जुन देव (1581 ई. से 1606 ई.)

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गुरु अर्जुन देव

सिक्खों के पांचवे गुरु गुरु अर्जुन देव (Guru Arjuna) थे। यह सिख धर्म के सच्चे संगठन करता सिद्ध हुए। धार्मिक अधिकारों के साथ राजनीतिक अधिकार से भी गुरु को संपन्न किया। जहांगीर के विद्रोही खुसरो को आशीर्वाद देने से जहांगीर ने इन्हें प्राण दंड दिया। आदि ग्रंथ के संकलन मसंद प्रथा को सुनिश्चित स्वरूप प्रदान करना धन संग्रह हेतू  विदेशों में अनुयाई भेजना ऐसे कार्य थे जिनसे सिख धर्म आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर हुआ। Sikh Dharma History में इनका विशेष स्थान है। गुरु अर्जुन देव का प्राण बलिदान सिखों में सैन्य शक्ति के रूप में शक्तिशाली बनने का बदलाव ले आया। अर्जुन देव का शहीद हो जाना सिख धर्म के इतिहास की एक युगांत कारी महान घटना थी जिससे शांति प्रिय सिख संघर्ष प्रेमी हो गए। सिख अब एक सैनिक संघ बन गया। गुरु अर्जुन देव के बाद उनका पुत्र गुरु हरगोविंद सिंह सिख गुरु बने।

गुरु हरगोविंद (1606 ई. से 1645 ई.)

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गुरु हरगोविंद

 Guru Hargobind Sahib Ji ने 'सैली' (ऊन की माला) की जगह दो तलवार  धारण की । एक तलवार पीरी धार्मिक गद्दी एवं दूसरी मेरी राजनीतिक पदवी की प्रतीक थी। भेंट में धन के स्थान पर अस्त्र-शस्त्र लेना प्रारंभ किया। हरमंदिर साहिब के पास एक भवन बनवाया जिसमें एक ऊंचा तख्त बनाया गया। इसे अकाल तख्त कहा गया। यह सिक्कों की राजनीतिक प्रभुता का प्रतीक बन कर उभरा। जहांगीर ने गुरु अर्जुन देव का आर्थिक जुर्माना पुत्र गुरु हरगोविंद से वसूल करना चाहा। इंकार करने पर गुरु हरगोविंद को जेल में बंदी बनाकर ग्वालियर के किले में रखा।

गुरु हरिराय (1645 ई. से 1661 ई.) 

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गुरु हरिराय

गुरु हरगोबिंद जी के आदेश के अनुसार Guru Har Rai जी ने 2200 घुड़सवार रखे हुए थे। मुगलों  को यह शक था कि उनकी यह फौज मुगलों के विरुद्ध लड़ने के लिए थी। पर गुरु साहब चाहते थे कि मुगल अपनी क्रूरता पूर्ण नीति त्याग दें और सभी को समान रूप से व्यवहार करें। उन्होंने हमेशा संयम से काम लिया जिस कारण से वे किसी भी लड़ाई में नहीं उलझे अनेक बार विभिन्न विरोधियों द्वारा उनको लड़ाई के लिए उकसाया भी गया परंतु वह अटल रहे वह गुरु ग्रंथ साहब की वाणी में लीन रहते थे इस कारण युद्ध और शिकार से दूर रहते थे दयावान और नम्रता के पुंज थे।
दारा शिकोह से संबंध :- दारा शिकोह शाहजहां का सबसे बड़ा पुत्र था। वह बहुत विद्वान और सूफी विचार को मानने वाला था । मुस्लिम उससे नफरत करते थे और अन्य धर्मों में उसका आदर सत्कार होता था। बड़ा पुत्र होने के कारण राजगद्दी पर उसका अधिकार होना था। औरंगजेब शाहजहां के सभी पुत्रों में से सबसे अधिक चालाक था । वह अपने धार्मिक कट्टरता के कारण मुस्लिमों में बहुत ख्याति प्राप्त था। उसकी इस कट्टरता के कारण मुस्लिमों उसे बादशाह के रूप में देखते थे । वह दारा शिकोह का कट्टर दुश्मन था और उसने विष देकर उसे मारने का प्रयास किया परंतु गुरु हर राय ने दवा भेज कर उसकी जान बचा ली। हालांकि बाद में औरंगजेब ने एक युद्ध में दारा शिकोह को गिरफ्तार करके क्रूरता पूर्वक उसकी हत्या कर दी।

गुरु हरकृष्ण (1661 ई. से 1664 ई.)

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गुरु हरकृष्ण

गुरु हरिराय जी ने गुरु Guru Har Kishan को गुरु गद्दी सौंपी थी। गुरु हरकृष्ण की आयु गद्दी पर बैठते समय काफी छोटी थी । बाबा राम राय सिख दर्शन और साधना आदि के ज्ञाता थे इस कारण हुए गुरु गद्दी पर स्वयं का अधिकार समझते थे। इस हेतु उसने अनेक प्रयास किए कि वह गुरु गद्दी के ऊपर बैठ सके। यहां तक कि वह औरंगजेब से सहयोग लेने भी गया था। परंतु उसके यह प्रयास सफल नहीं हो सके। गुरु हरकृष्ण जी ने अपने काल के दौरान सिख सिद्धांतों की व्याख्या की और धार्मिक उपदेश दिए। उस समय में चेचक की बीमारी आम थी। गुरु साहिब ने गरीबों अनाथों बीमारों के साथ जाकर उनकी सेवा की ।

गुरु तेग बहादुर (1664 ई. से 1675 ई.)

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गुरु तेग बहादुर

 Guru Teg Bahadur के पास हिंदू ब्राह्मणों ने अपने धर्म को बचाने के लिए प्रार्थना की तो गुरु साहिब ने तिलक और जनेऊ की रक्षा के लिए सिर वारने का फैसला कर लिया। अनेक विद्वान इसके अलावा गुरु तेग बहादुर जी के शहीदी के कई कारण मानते हैं जैसे औरंगजेब की कट्टरता के कारण वे शहीद किए गए क्योंकि वह गैर मुस्लिमों का दुश्मन था। गुरु साहब ने गुरु गद्दी मिलते ही धर्म के प्रचार के लिए देश में अनेक दौरे आरंभ किए जिस कारण हजारों श्रद्धालु उनकी शरण में आ गए। मुगल सरकार के जासूसों ने बादशाह को भविष्य में इसे मुगलों के विरुद्ध आने वाले खतरे के रूप में देखा और बताया । उन्होंने इसे मुगलों के विरुद्ध खतरे के रूप में बढ़ा चढ़ाकर बताया और उसे कार्यवाही करने के लिए उकसाया। गुरु तेग बहादुर में 8 जुलाई 1675 ईस्वी को गुरु गद्दी बाल गुरु गोविंद राय को सौंप दी और दिल्ली चले गए जहां उन्हें कैद कर लिया गया और इस्लाम स्वीकार करने के लिए अनेक अत्याचार किए गए । आखिरकार 11 नवंबर 1675 को इन्हें दिल्ली के चांदनी चौक में शहीद कर दिया गया।  उनके लिए लिखा गया है कि सिर दिया पर सार (सिरड) नहीं दिया। दिल्ली में उनका स्मारक चांदनी चौक में शीशगंज गुरुद्वारा नाम से प्रसिद्ध है।

हालांकि गुरु हरगोविंद ने सिख पंथ को सैनिक रूप देने का कार्य आरंभ कर दिया था परंतु बाद के सिख गुरु हरि राय (1645 ई. से 1661 ई.) गुरु हरकृष्ण (1661 ई. से 1664 ई.)गुरु तेग बहादुर सिख पंथ का प्रचार करने का ही कार्य किया। गुरु तेग बहादुर द्वारा मजहब स्वीकार न करने पर औरंगजेब ने उनका सिर कटवा दिया।

गुरु गोविंद सिंह (1675 ई. से 1708 ई.)

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गुरु गोविंद सिंह

Guru Gobind Singh गुरु तेग बहादुर के पुत्र थे। ये सिखों के दसवें और अंतिम गुरु हुए। पंजाब पर औरंगजेब के अत्याचारों का विरोध करने हेतु उन्होंने शस्त्र एवं शास्त्र शिक्षा हेतु शिक्षण केंद्रों का विकास किया। इससे सिख संप्रदाय सक्षम बना। लाहौर के सूबेदार को नदोण के युद्ध में पराजित किया। सिखों को संगठित करने उनकी कुरीतियां हटाने एवं नव चेतना जागृत करने के उद्देश्य से खालसा पंथ की स्थापना 1699 में की। बलिदानी 5 भक्तों द्वारा पंज प्यारों पाहुल (चरणामृत) एवं अमृत छकाना (पताशे घुला पानी) की नई प्रथा प्रारंभ की। खालसा पंथ के सिक्कों को पांच ककार अर्थात कड़ा केश कच्छ कृपाण और कंघा रखना आवश्यकत था। औरंगजेब से युद्ध की आशंका के कारण उन्होंने 1699 ईस्वी में ही आनंदपुर साहिब में एक सैनिक केंद्र खोल दिया। गुरु गोविंद सिंह धार्मिक स्वतंत्रता एवं राष्ट्रीय उन्नति का उनका आदर से रखते हुए सिखों के उत्कर्ष में लगे रहे। 1705 ईस्वी में मुगलों के आक्रमण के कारण उन्होंने आनंदपुर साहिब छोड़ दिया। आनंदपुर में छोटे दोनों पुत्रों जोरावर सिंह फतेह सिंह को कैद कर सरहिंद के किले में दीवार में जिंदा चुनवा दिया गया परंतु उन्होंने धर्म परिवर्तन नहीं किया। चमकौर के युद्ध में उनके अन्य दो पुत्र अजीत सिंह जुझार सिंह शहीद हुए। खुदाना के संघर्ष में 40 सिखों ने वीरगति प्राप्त कि उन्हें मुक्ता एवं स्थान को मुक्तसर कहा गया। गुरु गोविंद सिंह आनंदपुर से अंततः तलवंडी पहुंचे जहां 1 वर्ष तक उन्होंने साहित्यिक लेखन का कार्य किया। औरंगजेब के निमंत्रण पर वह मिलने जा रहे थे तभी उन्हें औरंगजेब की मृत्यु का समाचार मिला। 1 अक्टूबर 1708 ईस्वी को गुरु गोविंद सिंह ज्योति ज्योत समा गए।

महत्त्वपूर्ण सिख शख्सितें

बाबा बंदा सिंह बहादुर 

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बाबा बंदा सिंह बहादुर

Banda Singh bahadur Ka itihas

  बाबा बंदा सिंह बहादुर का मूल नाम माधवदास था। इनका जन्म 1670 ईस्वी में राजपूत परिवार में हुआ था और ये गोदावरी के तट पर आश्रम में निवास करते थे। गुरु गोविंद सिंह जी के दक्षिण प्रवास के समय उन्होंने स्वयं को गुरु का बंदा कहा अतः बंदा सिंह बहादुर के नाम से पहचाने गए। गुरु की आज्ञा से वे गुरु का शेष कार्य पूरा करने पंजाब में पहुंचे।इस समय सूबेदार वजीर खान के जुल्मों से पंजाब के लोग परेशान थे। यह सभी बंदा के नेतृत्व में संगठित हो गए। बंदा सिंह ने सर्वप्रथम सरहिंद पर धावा बोला। वजीर खाने जिहाद का नारा देकर पंजाब के समस्त मुस्लिमों से बंदा सिंह का मुकाबला करने का आह्वान किया। माझा के मुझाइल जट सिखों के सहयोग से छप्पर चिड़ी नामक स्थान पर वजीर खान के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। 3600000 वार्षिक राजस्व वाले प्रदेश पर बाबा बंदा सिंह बहादुर शासन करने लगे। किसानों को राहत देने के लिए बंदा सिंह ने जमींदारी प्रथा समाप्त कर दी। सरहिंद की वजह से उत्साहित सिखों ने अमृतसर बटाला कलानौर और पठानकोट पर अधिकार कर लिया। पंजाब में मुगल प्रशासन समाप्त हो गया। मुगल सम्राट बहादुर शाह को पंजाब में सेना भेजने। बंदा सिंह लोहागढ़ के पहाड़ी दुर्ग में चला गया। उसने मुगल सैनिकों पर छापामार नीति से आक्रमण प्रारंभ किए। बहादुर शाह की 28 फरवरी 17 को मृत्यु हो गई। नए मुगल बादशाह फर्रूखसियर ने सफेद खान के नेतृत्व में मुगल सेना बंदा सिंह के खिलाफ भेजी। डेरा बाबा में लंबे समय तक घिरे रहने के बाद बंदा सिंह बहादुर ने आत्मसमर्पण किया। दिल्ली में बाबा बंदा सिंह बहादुर और उनके सैकड़ों साथियों को शहीद किया गया। बाबा बंदा सिंह बहादुर महानत्यागी साहसी शूरवीर और धर्म के रक्षक थे। इन्होंने मुगलों का निर्भयता से मुकाबला करके सिखों में नवचेतना का संचार किया था।

महाराजा रणजीत सिंह 

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महाराजा रणजीत सिंह

Maharaja Ranjit Singh itihas

महाराजा रणजीत सिंह का जन्म 13 नवंबर 1780 ईस्वी में गुजरांवाला में हुआ। इनके दादा चाकिया मिशन के वीर नेता थे। उन्होंने अहमद शाह अब्दाली के विरुद्ध कई युद्ध किए। इनके पिता महा सिंह थे जिनकी मृत्यु 1792 ईस्वी में हुई। 1792 से 1797 ईस्वी तक शासन परिषद जिसमें इनकी माता इनकी सास तथा दीवान लखपत राय ने प्रशासन कार्य चलाया। 18 वीं शताब्दी के अंत में सिख मिसले विघटित अवस्था में थी। रणजीत सिंह ने इस स्थिति का लाभ उठाया वह शीघ्र ही शक्ति के बल पर मध्य पंजाब में 1 राज्य स्थापित कर लिया। महाराजा रणजीत सिंह ने 1799 इसमें लाहौर पर तथा 1805 विषय में अमृतसर की भंगी मिसल पर अधिकार कर लिया। 1803 में अकालगढ़ पर कब्जा कर लिया। 1804 ईस्वी में गुजरात के साहिब सिंह पर हमला कर पराजित किया। 18 सो 8 ईस्वी में महाराजा रणजीत सिंह ने सतलज नदी पार करके फरीदकोट मलेरकोटला तथा अंबाला को जीत लिया परंतु 1809 इसी में अमृतसर की संधि के बाद सतलज नदी के पार के प्रदेशों पर अंग्रेजों का अधिकार स्वीकार कर लिया गया। 1818 ई. में मुल्तान 1834 ईस्वी में पेशावर पर कब्जा किया गया। 1840 ई. में महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु हो गई।

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