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अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (International Court of Justice)


अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय की रचना, क्षेत्राधिकार तथा भूमिका


अंतरराष्ट्रीय न्यायालय - संयुक्त राष्ट्र संघ के अंगों में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय भी एक महत्वपूर्ण अंग है। इसने 1946 में काम करना शुरु कर दिया ।अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय राष्ट्र संघ की प्रमुख कानूनी संस्था है। कानून से संबंध रखने वाले प्रश्नों पर ही है विचार करता है। राजनीतिक झगड़ों का इससे कोई संबंध नहीं है। ऐसे देश जो इस न्यायालय के सदस्य हैं यदि किसी मामले में न्यायालय के समक्ष उपस्थित करना चाहे तो कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त सुरक्षा परिषद कानूनी विवाद उपस्थित होने पर उसे न्यायालय के समक्ष पेश कर सकती है व्यक्तिगत झगड़े अदालत में पेश नहीं किए जा सकते।

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अंतरराष्ट्रीय न्यायालय

संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर 92 से 96 तक के अनुच्छेदों में अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय का विधान है। अनुच्छेद 92 के अनुसार अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय संयुक्त राष्ट्रीय संघ का न्याय संबंधी प्रधान उपकरण होगा। उसका का सम विधान के अनुसार होगा जो परिशिष्ट में 4 के साथ संलग्न है। अनुच्छेद 93 के अनुसार प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य है कि वह न्यायालय के निर्णयों का ठीक तरह से पालन करें पूरा करो तो दूसरे पक्ष को अधिकार है कि वह सुरक्षा परिषद का ध्यान इस और उपयुक्त कार्यवाही के लिए आकर्षित करें। अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय की स्थापना 3 अप्रैल 1946 को हुई थी ।अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का संविधान अनुच्छेद में न्यायालय के अधिकार क्षेत्र कार्य संचालन नियम आदि आवश्यक तत्वों का उल्लेख किया गया है।

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय का गठन 

संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर की धारा 92 के अनुसार अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के लिए न्याय के अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय का गठन हुआ। अंतरराष्ट्रीय न्याय के स्थाई न्यायालय के समान ही न्याय के अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के जजों की संख्या 15 रखी गई यह न्यायाधीश अपने में से ही एक सभापति तथा उप सभापति को 3 वर्ष के लिए चुनते हैं। न्यायाधीशों का चुनाव सुरक्षा परिषद तथा संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 9 वर्ष के लिए किया जाता है। न्यायाधीशों का चुनाव जातिभेद ,रंगभेद ,धर्म भेद के आधार पर ना होकर योग्यता के आधार पर होता है। यह व्यक्ति अपने राष्ट्र में विधिवेता के रूप में ख्याति पा चुके होते हैं और अंतरराष्ट्रीय कानून के विशेषज्ञ माने जाते हैं।
उन्मुक्तीयां- न्यायाधीशों को अनेक विशेषाधिकार सौंपे जाते हैं। उनको राजनीतिक उन्मुक्त इयां प्रदान की जाती हैं। न्यायालय के सम्मुख वादियों के प्रतिनिधि परामर्शदाता और वकीलों को भी स्वतंत्रता पूर्व कार्य करने की छूट दी जाती है।
गणपूर्ति- न्यायालय के विधान के अनुसार इसमें 15 न्यायाधीशों के अतिरिक्त स्थाई न्यायाधीश नियुक्ति करने की भी व्यवस्था है। न्यायालय की गणपूर्ति 9 रखी गई है ।

अंतरराष्ट्रीय न्यायालय की प्रक्रिया

 न्यायालय के सभी निर्णय बहुमत से लिए जाते हैं पूर्ण बहुमत न होने पर सभापति का निर्णायक मत माने होता है। न्यायालय की भाषा फ्रेंच तथा अंग्रेजी या पूर्व एवं अन्य भाषाओं को भी अधिकृत रूप में प्रयुक्त किया जा सकता है। न्यायालय अपनी कार्य विधि और नियमावली स्वयं तैयार करता है । न्यायालय के सामने यह सब विवाद जा सकते हैं जिनको दोनों पक्ष उसके सामने रखना चाहे जिनका संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर अथवा किसी संधि के अनुसार न्यायालय में लाया जाना अनिवार्य हो। मुकदमा वादी और प्रतिवादी करा सकते हैं ऐसे राष्ट्र संघ के सदस्य नहीं हैं अपने विवाद का निर्णय इस न्यायालय द्वारा करा सकते हैं किंतु सुरक्षा परिषद द्वारा निर्धारित शर्तों को मानना पड़ेगा पूर्ण सुरक्षा परिषद सदस्य राष्ट्रों में दृष्टिगत हो।न्यायालय के विधान के मंतव्य के अनुसार मुकदमे के खर्च का कौन सा हिस्सा गैर सदस्य राष्ट्र को देना पड़ेगा इसका निर्णय न्यायालय ही करेगा। न्यायालय का निर्णय अंतिम समझा जाता है। निर्णय की अपील नहीं हो सकती किंतु कोई पक्ष समझे की कोई आवश्यक बात न्यायालय के समूह किसी कारण से उपस्थित नहीं हो सकी अप्रत्यक्ष रूप से कहीं भूल हुई है तब उस अवस्था में पुनर्विचार के लिए प्रार्थना पत्र दिया जा सकता है न्यायालय को अधिकार है कि अपना निर्णय देने से पूर्व किसी व्यक्ति विशेषज्ञ कमेटी द्वारा मुकदमे से संबंधित किसी भी विषय के संबंध में जांच करा ले।मुकदमे की सुनवाई आमतौर से सार्वजनिक रूप से होती है किंतु न्यायालय सोता है अतः वादी प्रतिवादी की प्रार्थना पर बंद कमरे में मुकदमे की सुनवाई कर सकता है। सभी प्रश्नों का निपटारा उपस्थित न्यायाधीशों के बहुमत से होता है। यदि किसी प्रश्न पर न्यायाधीशों का मत बराबर हो तो सभापति अथवा उसकी अनुपस्थिति में जो सभापति का संग्रहण कर रहे हो अपना निर्णायक मत दे सकते हैं। यदि निर्णय सर्वसम्मति से नहीं हो अवस्था में वालों को भी अपना मत व्यक्त करने का अधिकार है मुकदमा अदालत में पढ़ा जाता है और उस पर सभापति एवं रजिस्ट्रार के होते हैं।साधारण तो यदि राष्ट्रीय न्यायालय की तरह फैसले में जीतने वाले राज्य को मुकदमे का व्यय पाने का उल्लेख ना हो तो समझा जाता है कि न्यायालय का विचार है कि प्रत्येक पक्ष अपना खर्च स्वयं उठाएं । मुकदमे की सुनवाई के लिए कम से कम 9 देशों की उपस्थिति अनिवार्य है। न्यायालय का खर्च सभी देश देते हैं। खर्च का कितना हिस्सा किसको देना पड़ेगा इसका निर्णय महासभा करती है। राष्ट्र संघ के वार्षिक बजट में न्यायालय का बजट भी सम्मिलित रहता है और महासभा न्यायाधीशों तथा रजिस्टर का वेतन निर्धारित करती है। न्यायालय में मुकदमे की सुनवाई दूसरे देश में भी हो सकती है ।

अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का क्षेत्राधिकार

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय का क्षेत्राधिकार निम्न तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है।

  1. ऐच्छिक क्षेत्राधिकार - अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के संविधान की धारा 36 के अनुसार न्यायालय उन सभी मामलों पर विचार कर सकता है जिन को संबंधित राज्य न्यायालय के सम्मुख प्रस्तुत करें। केवल राज्य ही न्यायालय के समक्ष पक्षकार के रूप में उपस्थित हो सकते हैं। न्यायालय का क्षेत्र है और चार्टर पर हस्ताक्षर करता राज्य राज्यों की इच्छा पर निर्भर करता है जिन्होंने सुरक्षा परिषद की सिफारिश पर महासभा द्वारा लगाई गई शर्तों को स्वीकार कर लिया है। न्यायालय का क्षेत्राधिकार उन सभी विवादों पर है जो पक्षकार इनके पास भेजना चाहते हैं। न्यायालय का क्षेत्र भी है जिनकी या प्रचलित संधियों में विशिष्ट रूप से व्यवस्था की गई है। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का क्षेत्राधिकार का प्रयोग औचित्यता के आधार पर भी कर सकता है।
  2. अनिवार्य क्षेत्राधिकार -राज्य स्वयं घोषणा करके इन क्षेत्रों में न्यायालय के आवश्यक सत्र अधिकार को स्वीकार कर लेता है। यह है संधि की व्याख्या अंतरराष्ट्रीय कानून के क्षेत्र से संबंधित सभी मामले किसी ऐसे तथ्य का अस्तित्व जिसके सिद्ध होने पर किसी अंतरराष्ट्रीय कर्तव्य का उल्लंघन समझा जाए अथवा किसी अंतर्राष्ट्रीय विधि के उल्लंघन पर क्षतिपूर्ति का रूप और परिणाम पूर्णविराम प्रोफेसर ओपेनहीम ने न्यायालय के क्षेत्राधिकार को वैकल्पिक आवश्यक क्षेत्राधिकार कहा है।
  3. परामर्श संबंधित क्षेत्राधिकार- अंतरराष्ट्रीय न्यायालय द्वारा परामर्श देने का कार्य भी संपन्न किया जाता है। महासभा अथवा सुरक्षा परिषद किसी भी कानूनी प्रश्न पर अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय का परामर्श मांग सकती है। संयुक्त राष्ट्र संघ के दूसरे अंग तथा विशेष अभिकरण भी उनके अधिकार क्षेत्र में उठने वाले कानूनी प्रश्नों पर न्यायालय का परामर्श प्राप्त कर सकते हैं। परामर्श के लिए न्यायालय के समक्ष लिखित रूप में प्रार्थना की जाती है। इस प्रार्थना पत्र में संबंधित प्रश्न का विवरण तथा वे सभी दस्तावेज होते हैं जो प्रश्न पर प्रकाश डाल सकते हैं। न्यायालय का परामर्श केवल परामर्श है जिसे मानने के लिए किसी भी संस्था को बाध्य नहीं किया जा सकता।

न्यायिक निर्णय की क्रियान्विति

संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्णय को कार्यान्वित करने के लिए संघ के चार्टर की धारा 94 में व्यवस्था की गई है। इसके अनुसार संघ का प्रत्येक सदस्य प्रतिज्ञा करता है कि वह किसी मामले में विवाद उत्पन्न होने पर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के फैसले को मानेगा। यदि न्यायालय के निर्णय के लिए आवश्यक कार्यवाही तय करते समय सुरक्षा परिषद के 9 सदस्यों की स्वीकृति आवश्यक है।इसमें से पांच स्थाई सदस्य भी होने चाहिए। सुरक्षा परिषद जैसा आवश्यक समझे वैसी कार्यवाही करेगी। पवार में यह देखा गया है कि न्यायालय के निर्णय का राजा आदर करते हैं। ने भी लिखा है कि दोषी राज्य अपनी पोल खुलने से बचने के लिए विवाद में सहमति पूर्ण निपटारे के लिए तैयार हो जाते हैं पूर्ण न्यायालय के मत ना नैतिक बल भी बहुत अधिक होता है और यदि कोई निर्णय की अवहेलना करता है तो उसे भी विश्व जनमत के सामने झुकना पड़ता है।
माली द्वारा कानून का प्रयोग के नियमों के अनुसार अंतरराष्ट्रीय न्यायालय वादों का निर्णय करने में अंतर्राष्ट्रीय विधि का प्रयोग करते हैं। देने के लिए अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में पेश किए जाते हैं उन वादों में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के न्यायाधीश निम्नलिखित विधियों का प्रयोग करते हैं।

  • सामान्य अर्थों विशिष्ट पूर्ण अंतरराष्ट्रीय संधियों और समझौते जिनको वादग्रस्त पक्ष स्वीकार करते हो।
  • वे अंतरराष्ट्रीय परंपरा और रीति-रिवाज जिन्हें सामान्यता प्रयोग में माना जाता है।
  • सभी राष्ट्रों द्वारा मान्यता प्राप्त कानूनों के सामान्य सिद्धांत।
  • भिन्न भिन्न राज्यों के विधि बताओ और न्यायाधीशों द्वारा दिए गए निर्णय।

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